श्री सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा का प्रतीक चिन्हश्री सनातन धर्मप्रतिनिधि सभा

माँ वैष्णो देवी चालीसा

दोहा

सीपवा स्वरूपा सर्वगुणी, मेरी मैया वैष्णो कष्ट निदान। शक्ति भक्ति दो हो हमें, दिव्य शक्ति की खान॥ अभय दायिनी भय मोचनी, करुणा की अवतार। संकट दूर करो भक्तों का, कर दो उधार॥

चौपाई

गुफा निवासिनी मंगला माता, कला तुम्हारी जग विख्याता। अल्पबुद्धि हम मूढ़ अज्ञानी, ज्ञान उजियारा दो महारानी॥

दुख सागर से हमें निकालो, भ्रम के भूतों से मुझे बचालो। पुत्रों के सब अवरोध हटाना, अपनी छाया में मुझे छुपाना॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

भक्त वत्सला भैरव हरिणी, आदि अनंता मुझे जगत जननी। दिव्य ज्योति जहाँ होय उजागर, वहाँ उदय हो धर्म दिवाकर॥

पाप नाशिनी पुण्य की गंगा, तेरी सुधा से तरें कुसंगा। अमृतमयी तेरी मधुर वाणी, हर लेती अभिमान भवानी॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

सुखद सामग्री दो भागतन को, करो फलदायक मेरे चिंतन को। दुख में ना विचलित होने देना, धीरज धर्म ना खोने देना॥

उत्साह वर्धक कला तुम्हारी, मार्गदर्शक बनें हमारी। घेरे कभी जो विषम अवस्था, तू ही सुझाना मुझे कोई रास्ता॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

बिना द्वेष के विषधर काले, जो सद्भाव को डसनेवाले। उनपर अंकुश सदा लगाना, दुर्गुण को सद्गुण से मिटाना॥

परम तृप्ति का जल देना, दुर्बल काया को बल देना। आत्मिक शांति के अभिलाषी, कहते बना दे दरिद्र विश्वासी॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

बसी हो तुम श्रीधर के मन में, ज्योति तुम्हारी है कण कण में। हम अभिषेक मुझे करें तुम्हारा, कर दो मुझे उधार हमारा॥

वियर लंगूर प्रहरी तेरे, भजें तुम्हें मुझे संग सवेरे। विश्व विजयी है तेरी शक्ति, भाव निधि तारक पावन भक्ति॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

विघ्न हरण जग पालन हरी, सिंह वाहिनी भेंट प्यारी। कृपा की हम पर दृष्टि करना, सच्चे सुख की वृष्टि करना॥

यश गौरव सम्मान बढ़ाना, प्रतिभा का सूरज चमकाना। स्वच्छ सार्थक श्रद्धा देना, शरणागति में हमको लेना॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

शारदा, लक्ष्मी और महाकाली, तीनों का संगम बलशाली। रखना सिरों पे हाथ हमारे, सदा ही रहियो साथ हमारे॥

विपदा भाव भय हारना, दुर्गम काज सुगम मुझे करना। हे दिव्य ज्योति सर्वव्यापक, तेरी दया के हम हैं याचक॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

बुद्धि विवेक विद्या दायिनी, शक्ति तुम्हारी है रसायनी। रोग शोक संताप को हारती, दुर्लभ वस्तु सुलभ है करती॥

जाप तेरा जब रंग दिखता, भावनावी का जल सुख है जाता। रत्नों से घर भर दो मैया, विष को अमृत कर दो मैया॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

भक्ति सुमन जो करते अर्पण, धो धो उनके मन के दर्पण। हे त्रिभुवन की सिरजनहारी, सदा ही राखियो लाज हमारी॥

सुख में जीवन का वार देना, सकल मनोरथ सीध कर देना। हिम पर्वत पर रहनेवाली, करना आश्रित की रखवाली॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

दैत्यों की संघारक माता, अंबे कष्ट निवारक माता। अखिल विश्व है तेरे सहारे, रोम रोम तेरा नाम उच्चरे॥

स्वामिनी हो उत्थान पतन की, त्रैलोकी के आवागमन की। हाथ दया का सिर पर धारणा, हे मंगला मुझे अमंगल हारना॥

जय जय अंबे जय जगदंबे॥

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